DineshYadav


विषय प्रवेश:
‘ऋतु’ शब्द ‘ऋत’ सँ बनल अछि । ई ज्ञानक परम्पराक एकटा विशिष्ट पारिभाषित शब्द थिक– एकर आत्यंतिक अर्थ होइछ– ‘अस्तित्व अर्थात् चराचर सत्ताके संचालन करैवाला परम नियम ।’ एहन नियम जेकरा, कियों बनबैत नई छहि, मुदा अस्तित्वक सत्तामें ई अपने आप समाहित अछि । समय आ जीवनमें ‘संस्कृति’क रचना मनुख करैत छहि । प्रकृतिक चक्रमें ऋतु अबैत अछि– लोक ऋतुसँ जुडल पर्व–त्यौहारक रचना कएलक अइछ–पर्व–त्यौहारक देवता आ पूजा–अनुष्ठान, पर्वसभके संगैह नृत्य आ गीत, चित्र आ शिल्प, विश्वास आ लोकाचार स्थापित भेल अछि (तिवारी, सन् २००९) । तईं ‘लोकक ऋतुगीत प्रकृतिके सुन्दरता, पर्व–त्यौहारक ‘मंगल अवसर’ आ ‘संस्कृतिके रचना उत्सव’ संगैह अछि ।

पर्व त्यौहार प्रकृतिके शृंगार थिकैह । प्रकृति ऋतुके माध्यमसँ अपनाके अभिव्यक्त करैत छयैक आ मनुख गीत, संगीत, कथा, कविता आ ललितकलाके माध्यमसँ अपने आपके अभिव्यक्त करबामें सुविधा महशूस करैत आइब रहल अछि । एहा कारण थिक जे कविता/गीत आ कलाके वाचिका परम्परामें लोक विधाक विविधता आ समृद्धि देखबामे अबैत अछि (जोशी, सन २००९) । ऋतुक वर्णनमें लोकगीतक कोनो सानी नइ छैक । चाहे ओ संस्कार गीत होए अर्थात पर्व–त्यौहारक गीत होए । चाहे गीत कथा, गाथा अर्थात् लम्बा आख्यान होए, अर्थात लोकवार्ता (लोककथा, कहावत, पहेली आदि) होए । सबसँ अधिक वर्षा ऋतुक वर्णनमें विधाके वैविध्य भेटैत अछि । एकर उदाहरण चौमासा, छौमासा आ बारहमासा गीत छयैक, जहिमे विविधतायुक्त मैथिली क्षेत्रक बोली भरल–पुरल अछि । ई एकटा विशिष्ट आ सुपुष्ट सांस्कृतिक परम्पराक साक्षात प्रमाण अछि , जे मैथिली संस्कृतिके निर्माण, विस्तार आ उन्नयनमे अमित सहयोग करतै आइब रहल अछि ।

मैथिलीमे लोक–संस्कृति, लोक–गीत, लोक–कला, लोक–गायन, लोक–कथा आ लोक–परम्परा अनुपम अछि । अहिसभके जोडबाक आ अछ्युन्न रखबाक काज लोक–साहित्य करैत आइब रहल अछि । लोक–साहित्य यथार्थत: एकटा विराट वृक्षके सदृश होइत छहि, जकर वृंत पर मानव जीवन आ सांस्कृतिक लतिका सब फुलैत–फलैत छहि । लोक–साहित्य मानव समाजक ओहि लोकक साहित्य थिक, जे सभ्यता, औपचारिकता आ नागरिक संस्कार सबसँ दूर अपन आदिम प्रवृत्तिसँ आबद्ध सहजावस्थामें जीवन व्यतीत करैत छहि (मिश्र, सन् २००८) । अहिमें हुनक समस्त भावधारा विरामहीन आ अन्तहिन रुपमें प्रवाहित होइत रहैत अछि । परम्परा एकर आधार अछि आ जनभाषा एकर अभिव्यंजनाक माध्यम । श्रुति आ स्मृतिकेद्वारा ई जनजीवनमें संचित आ सुरक्षित रहैत अछि । लोक साहित्य पर महापण्डित राहुल सांकृत्यायनक ई कथन ओकर वास्तविकताक चित्रण करैत अछि । ओ कहैत छइथ, ‘यथार्थत: लोक–साहित्य ओतबे स्वभाविक अछि, जतेक जंगलमें खिलैवाला फूल, ओतबे स्वच्छंद, जतेक आकाशमें विचरन करै वाला चिडैय, ओतबे सरल आ पवित्र, जतेक गंगाक निर्मल धारा ।’ मैथिली क्षेत्रमे गुञ्जयमान होमेवाला चौमासा, छौमासा आ बारहमासाके एकर उदाहरणक रुपमे लेल जा सकैत अछि । कियैक त ई प्रकृतिक नियम ‘ऋतु’ सभसँ जुडल अछि । मैथिली भाषी क्षेत्रमें शायदे कुनू ऋतु भेटत जाहिमे सांस्कृतिक चर्चा नहि भेल होए । ऋतु अनुसार लोकाचार,पर्व–त्यौहार आ गायन संस्कृति ओतेह भेटयैक छयैक । पर्व त्यौहारक समयमे पियाक विरहमे गाओल गीतसभहक प्रचूरता अछि । चाहे ओ परेदिया पियाक विरह वेदनामे छटपटायत विरहणीक गीत होए या परदेश कम्बैक लेल जाइत कालक विदाईक क्षण होए, सभटामे ऋतु अनुसारक भाष, शैली आ रोदन भेटयैक छयैक । अहूमें पीडित नारीक दु:ख आ वेदनाक वर्णत अत्याधिक छयैक ।

ऋतुमे गीतक महत्व:
हरेक मास आ ऋतुमें कुनू ने कुनू पर्व, त्यौहार मनेबाक मैथिली भाषी क्षेत्रक परम्परा रहलैए । कुनू भी समाजमें संस्कृति आ सभ्यताबीच अन्योन्याश्रय संबन्ध रहलैए । बदलैत समय चक्रके साथ अईमे बहुत रास बदलाब आइब रहल अछि । मुद्दा मैथिली भाषी क्षेत्रक किछु कथित बबुवान सबहक कारण अखनो ई क्षेत्रमें संकिर्णता जकडले अछि । किछु गोटा भाषाक अपन विर्ता ठाइन ओकरे अपन बपौती मानैत छहि । तईं जन–जनकें खान–पियन, रहन–सहन, उपासना, बोली, व्यवहार, बचन, शैलीके वर्षौस“ उपेक्षा होइत रहल अछि । भाषामें समानता, व्याकरणीय स्वरुप, लिपी, भाषिक शैली मुलभूत बात होइतहू विविधतास“ भरलपुरल मैथिली क्षेत्रमे आन मैथिलीजनकें अछोप आ अछुतक व्यावहारकें कुनू दृष्टिकोणस“ सहि किन्चित नहि मानल जा सकैत अछि ।

ओइ पारक मैथिली भाषी क्षेत्रक वरिष्ठ कवि आ सह–गीतकार विनयकुमार मिश्रक हेमंत ऋतुपर लिखल कविता ‘अर्क–जनास–पलास फुलायल, अमराईमें मंजर छायल….’ मैथिलीमें ऋतुक पिछुलका बेजोड प्रस्तुति मानल जा सकैत अछि । विजयशंकर मल्लिकक कविता ‘सरियहुं ऋतु वसंत फुलायल…’ के सेहो एकर एकटा कडिक रुपमे लेल जा सकैत छयैक । ई दुनू कविवर अपन ई रचनासभ करिब तीन वरख पहिने भारतक झाडखण्डके बोकारोमे ‘साहित्य अकादमी एवं मिथिला सांस्कृतिक परिषद्’ द्वारा आयोजित परिसंवादमें वाचन कयने छलाह (दैनिक जागरण, सन् २०१७) । मैथिलीमे नियमित प्रकाशित होमेवाला ‘आंजूर’ पत्रिकाके माध्यमस“ वरिष्ठ साहित्यकार, लेखक आ विद्वान रामभरोस कापडि ‘भ्रमर’ संस्कृति आ ऋतुक अन्योयाश्रित सम्बन्ध पर एकटा सुनहगर शृंखला शुरु केलैत अछि । ई एकटा सकारात्मक पक्ष अछि ।

मैथिली साहित्यमे ऋतुक मनोरम वर्णन भेटैत छहि । मैथिली भाषी क्षेत्रमे समैया गीत अर्थात् ऋतु गीतक कथा वस्तुमे मुख्यत: प्रेम ओ तद्जन्य आकर्षण, वियोग, नैराश्य वा असंतोष रहैत छहि । चौमासा, छओमासा तथा बारहमासा प्रभृति गीतिमे एकाधिक ऋतुक वर्णन होइत अइछ । एहिमे प्रत्येक मासक विशेष अनुभूति तथा नायक–नायिकाक परस्पर वियोगक चित्रण रहैत अछि । चैतावर, फागु, पावस, मलार ओ वसन्त अन्य ऋतुगीति–प्रकार थिक जे मुख्यत: प्रेमगीत थिक तथा मास विशेष किंवा ऋतु–विशेषमें गाओल जाइत अइछ (झा, सन् २०१३–१४) । ऋतु गीत सबमे जे मौलिक छन्द, धुनि, स्वर, भास तथा शब्द–विन्यास भेटैछ छैक ओ सबटा लोकजीवनस“ अनुप्रमाणित अछि । समाजक दर्पण एकरा कहि सकैत छि ।

मैथिली भाषी क्षेत्रमे आल्हा–रुदल गीतके लेल वर्षा ऋतुके उपयुक्र्त मानल जाइत छहि । एहि सम्बन्धनमें जनसाधारणमें प्रचलित धारणा अछि–

‘भरी दुपहरी सरवन गाइय, सोरठ गाइये आधी रात ।
आल्हा पँवाडा वा दिन गाइय, जा दिन झडी लगे बरसात । ’

वर्षा ऋतुमे गावैवाला दूसर गायन शैली अछि मलार । मलारक शैली विरह व्यस्थाक वर्णन करबाक बेजोड औजार अछि । ई विशुद्ध एकटा वर्षाकालिन गीत थिकैह । मलारक पाति–

उधो प्राणनाथ नहि आये
आयल प्रवल दिवस ऋतु वरसा ।
तापर घन घहराये
चितवन चौंक फटय मोर छतिया
कत दिन मोहि सताये ।…….

होरी अर्थात् फगुवा :
होरी, चैतीसहितके सामुहिक रुपस“ गाबैयवला गीत सेहो ऋतु गीत थिक । जाहिंमें शृंगार भाव अपेक्षाकृत अधिक भेटैत छयैक । होरीके अवसर पर पुरुषसभद्वारा गाओल जाइवला फगुवा ऋतु गीत अछि । बसन्त पंचमीस“ होलिकाष्टकधरि एकर गायन गामघरमे चलैत रहैत अछि (दीक्षित, सन् २०१६) । होरी या जोगिरा विशुद्ध बसन्त गीत अछि । डम्फूक तालमे पुरुषक समूह अपन भडास जोगिरा मार्फत् निकालिते छहि, संगैह दूसरके मनोरञ्जन सेहो ओतवे प्रदान करैत छहि । होरी गीतमें माससभहक चर्चा कम भेटयैक छहि । तइयो एकरा वसन्त ऋतुक उल्लास आ आनन्दक विशिष्ट रचना मानल गेल अछि । एकर एकटा उदाहरण–
‘शिवा मंठपर राम खेलैय होरी, शिवा मंठ पर……’

बसन्त ऋतुके अद्वितीय पर्व फगुवामे मात्र गावैवाला अहि गीतमे लाले लाल पुआ पकेबाक प्रशंसा पुरुषद्वारा कयल गेल अछि –

परदेसिया लै अङना निपाबे गोरिया ।
जब परदेसिया नगर बीच आयल ।
लाले लाल पुआ पकावे गोरिया । परदेसिया लै ।।

मैथिली क्षेत्रक ई चर्चित बोलके होरी गीत अछि । अहिमे शिवक मंठपर रामक उल्लेख कयल गेल अछि । ऋतुक चर्चा नहि होइतहू डम्फा आ पुरुषक सामुहिक गायन, लय, भास आ शैली बसन्तक चित्कारके प्रतिबिम्बित करैत छयैक । तहिना जोगिरासभमे सेहो अहि तरहे भावानुभव कयल जा सकैत अछि –

‘जोगिरा सरर.., नाचे पतरी पैसा लिए मोटकी सररर….’
‘जोगिरा सरर..,कून तालपर ढोलक बजय , कून तालपर मृदंग….’

फागु लोकगीतमे मासक चर्चाक एकटा बेजोड उदाहरण–

‘सावन भादो में बलमुए हे
चुअई छई बंगला
सावन भादो में
पाँच रुपैयाँ पिया नौकरी से लायल
गहना गढाउ, कि छवाऊ बंगला…..’

वसन्त गीतके कनिक फराक शैली सेहो भेटयैक छयैक, मिथिलामे । ओकार स्वाद किछु फराक अनुभूति होइतहू ओहिमे समटल गेल भाव, राग आ शैली बसन्त ऋतुक उन्मादक प्रतिनिधित्व करैत देखल गेल अछि –

सरस वसन्त भेल सजनी गे दखिन पवन बहु धीरे ।
सपनहु रुप वचन एक भाखिय मुखसँ दूर करु चीरे ।।
तोहर बदन सन चान होथि नहि यदपि जनत विधि देथि ।
कय वेरि काटि बनाओल नव के तदपि तुलित नहि होथि ।।
लोचन तूल कमल नहि भय सक से नहि के जग जाने ।
तै पुनि जाय नुकायल जल मे पंकत एहि अपमाने ।।
मदन बदन परतर नहि पावथि जब भरि तोहरहि जोहि ।
भनहि विद्यापति सुनु वर यौवति उपला सुझय न मोहि ।।

चैतावरक परम्परा :

होरीक बाद शुरु होइत अछि चैत माह । अहि माहमे चैती वा चैतावर गयैबाक परम्परा मिथिलामे छयैक । कोइलीक बोलीक चर्चा अहि तरहे गीतसभमे बेसि भेटयैक छयैक । पियाक परदेश जयैबाक काल नारीक करुणामय बेदनाक बेजोड नमुना–

आन दिन बोले कोइली भोर भिनसरवा
आजु बोले अधरतिया हो रामा
तोरे बोली सुनिके पिया मोर जागल
उठि चलल परदेशवा हो रामा ।
श्रावण महिनामे गाओल जाइवाला गीत झुला थिक ,
छल मनोरथ आयोत प्रथम मास असाढ यो
हमर वालम किछु ने जानथि तेजि गेला विदेश यो ।……..

षडऋतु आ बटगबनी :
मैथिली क्षेत्रमे प्रचलित बटगबनीमें सेहों मासक प्रयोग होइत अछि । १२ मासमें दू–दू मासक षडऋतु होएत अछि । तईं बटगबनी सेहो ऋतु गीतसँ सम्बन्धित छयैक । बटगबनीके किछु उदाहरण –

१.
अवधि मास छल भादव सजनी गे
निज कय गेला बुझाय
से दिन आबि तुलायल सजनी गे
धैरज धयल ने जाय…..

२.
बहिना कोना कँ कटबै साओन राति अन्हरिया
पिया छै नोकरिया ना
एक तँ राति अन्हारि, सूझय आ ने दुआरि
बहिना कोना कँ सुतबै पिया के पलंगिया
पिया छै नोकरिया ना
सखी सब झुमि–झुमि गायब गीत, दूर हम्मर मोनक मीत
बहिना बीतल जाई छै काँच उमेरिया
पिया छै नोकरिया ना

वर्षा ऋुतक चर्चा अहि गीतमें बेजोड रुपसँ प्रस्तुत कएल गेल अछि । बटगबनीमे सेहो ऋतु राग शैलीमें विरहके बेदनाक अत्यन्त मार्मिक रुपमें प्रस्तुत कयल गेल भेटैत अछि । निचा देल गेल दूटा गीत एकर पुष्टि करैत छयैक–


जखन गगन घन गरजत सजनी गे
सुनि हहरत जीव मोर सजनी गे
प्राणनाथ परदेश गेल सजनी गे
चित भेल चान चकोर सजनी गे………
–बटगबनी
२.
पिअबा जे कहि गेल जेठ मास आयब,
बीति गेल मास अखाढ सखि
बाट रे बटोहिया कि तोंही मोर भइया,
हमरो समाद नेने जाउ सखि
हमरो समदिया भइया पिया जी केँ कहि देव……

विरहके चार मास :
चौमासा सेहो ऋतु गीतके ही रुप थिकैह । अहिमें वर्णन आ उल्लेख कएल गेल मासक नाम ओकर पुष्टि करैत छयैक । चौमासामे शिव शंकर, राम सिया, कृष्णक चर्चा खुब कएल गेल अछि । विरहकें बेदना भगवानक नाम लकें या भगवानके मुहसँ व्यक्त कएल जाइत परम्परा सेहो मैथिलीभाषी क्षेत्रमें भेटैत अछि । उदाहरण –


केओ ने बुझाबय किए शिव शंकर रुसला अपना मन मे
कार्तिक मास गगन उजियारी, बिछुरल सोच भई मन मे
कार्तिक गणपति कोरा शोभथि, एकसरि रहब कोना वन मे
अगहन अधर अंग रस छूटय, अधिक संदेह होअय मन मे
छोडि गेलाह शिव मृगछाला, लइयो ने गेला अपन संग मे
पुस मास पाला तन पछि गेल, चहुँदिस छाय रहल वन मे
धरब भेष योगन के शिव बिनु, शिव शिव रटन लगाय मन मे
सिहरि सिहरि सारी रैन बिताओल, पिया बिनु माघ बडा रगडी
भेटथि देव सखा हमर जँ, पूरय मन अभिलाष सगरी
२.
अवध नगर लागु रतनक पालना, झुलय राम सिया संग मे
चैत चकोर समान सखि रे, मालती आशा लेल कर मे
नित नव सुरति निरेखू रघुवर के, पलको ने लागय मोर नयन मे
आयल बैसाख सकल पुर–परिजन, औल पडय तन–मन मे
चानन अतर गुलाब काछि कय, सींचय प्रभुजी के गातन मे
जेठ मास भरि कनक कटोरी, लय मिश्री पकवानन मे
रुचि रुचि भोजन करु रघुनन्दन, बिजुरी छिटकि रहू दांतना मे
आयल अषाढ घेरि घन बदरी, पवन बहय पुरिबाहन मे
दान देहू रनिवास राजा मिलि, प्रेमलाल हरषे मन मे
३.
कोना जीअब बिनु कुंअर श्याम हो, बिरहा घेरि लइ तन मे
फागुन मास आस हिय सालय, फडकि–फडकि उठय छतिया
केओ नहि मोर विपत्ति केर संगी, अगहन लिखि भेजु पतिया
चैत मास वन टेसू फूलय, मोहि ने भावय घर–अंगना
कोइली कुहुकि–कुहकि हिया सालय, होअय मन जा डुबी यमुना
ठाढ बैसाख तोहें होउ बटोही, तोहें देह–दशा मोरा देखू हे
जाय कहू ओहि नटबर श्याम सँ, विरहिन प्राण नहि राखू हे
जेठ मास पिया वारी सोहागिन, चानन अंग लेपू घसि के
भेटलथि श्याम सखा मोरो स्वामी, मन अभिलाषा पूरय सभ के

भगवानक संवोधन बिना सेहो चौमासा रचल गेल अछि । जाहिमें मेघक चर्चा पियाक परदेश जयैबाक कालक दारुणमय वेदनाक प्रतिबिम्बित करैत भेटयैक छयैक–

माघ हे सखि मेघ लागल, पिया चलल परदेश यो
अपनो वयस ओतहि बिताओल, हमरा के बारि बयस यो
फागुन हे सखि आम मजरल, कोइल शब्द घमसान यो
कोइली शब्द सुनि हिया मोर सालय, नयना नीर बहि गेल यो
चैत हे सखि फुलल बेली, भ्रमर लेल निज बास यो
तेजि मोहन गेल मधुपुर, हमरा सँ कओने अपराध यो
बैसाख हे सखि उखम ज्वाला, पिया रोपल चम्पा गाछ यो
ताहि तर हम ठाढ भेलौं, बहि गेल शीतल बयार यो

चौमासामे असाढ, साओन, भादव आ आश्विनमे गाबैयवाला गीत
वियोग वेदनाक मार्मिक प्रस्तुति भेटयैक छयैक –

माघ मोहन नेह लगायल अपने चलल परदेश यो
ओहि रे परदेशिया रामा ओतहि गमाओल हम धनि बाडि बयस यो ।
फागुन हे सखि आम मजरल कोइरी शब्द घमसान यो
कोइली शब्द सुनि हिया मोर सालय नैनासँ झहरय नोर यो
चैत हे सखि चित्त चंचल यौवन भेल जीवकाल यो
आन धन रहितय बेची हम खइतौं ई धन बेचलो न जाय यो
बैशाख हे सखि विषय ज्वाला घामसँ भीजल शरीर यो
रगडि चन्दन अंग लेपितहुँ जौं गृह रहितथि कन्त यो ।

छमासाके मार्मिकता :
छमासा गीतमे छ मासके चर्चा होइत अछि । अहिमे अषाढसँ शुरु होइत साओन, भादव, आसिन, कातिक आ अगहन मासक मौसम/समयमें होमेवाला टिसक वर्णन मार्मिक शैलीमे कएल गेल भेटयैक छयैक –

चलू सखि हे सहेलिया , बिषम लागे
आइ अषाढ मास हे सखिया, चहु दिस बुन्द बरसे दिन रतिया
बिषम लागे
साओन के दुखदाओन रतिया, कुबजी हरकनि हुनको मतिया
बिषम लागे
भादव के निशि राति अन्हरिया, सपनो मे देखल हुनकर सुरतिया
विषम लागे
आसिन आस लगाओल सखिया, नहि आयल पिया निरमोहिया
विषम लागे
कातिक कंत उरन्त भेल सखिया, सिन्दूर–काजर ने शोभय सुरतिया
विषम लागे
अगहन अग्र सोहावन सखिया, सारिल धान कटायब कहिया
विषम लागे

छमासाक एकटा अउर मनमोहक गीतक किछु पंक्ति, जाहिंमे प्रितमक प्रतिक्षाक चर्चा कएल गेल अछि –

छल मनोरश प्रितम आओत प्रथम मास अषाढ यो
हमर वालम किछु ने जानथि तेजि गेला विदेश यो
साओन हे सखि–सर्व सोहाओन फुलय बेली चमेलि यो
ताहि सौरभ भ्रम लुबधल करय मधुर रस केलि यो …….

शृंगारिक विरह–मिलनक बारहमासा :
शोधकर्ता आ गायिका मीनाक्षी प्रसाद भारतीय अखबार ‘अमर उजाला’ मे अपन आलेख मार्फत् कहैत छनि, ‘बारहमासा मूलत: एक विरहप्रधान लोक संगीत थिक । वर्ष भरिके बारहमासमें नायक–नायिकाके श्रृंगारिक विरह आ मिलनक क्रिया सबके चित्रणके बारहमासा कहल जाइत अछि । ई गीतमें ओ अपन दशाके प्रत्येक मासके खासियतसंग परोसैत छथि । अहि शैलीमें ज्यादातर कोनो स्त्रीजन के पतिदेव परदेस कमेबाक लेल गेलाक बाद अउर ओ दुखी मनसँ अपन सखीके बतबैत छहि जे पति बिना हमर मौसम व्यर्थ अछि ।’

‘सैंय्या मोरा गइले विदेसवा सखीरी ।
जिआ नाहीं लागे ।।
चार महीना गर्मी के लागल ।
नाहीं भेजे कौनो संदेसवा सखीरी ।।
–पारंपरिक बारहमासा

मैथिली कवि विद्यापति ठाकुरक बारहमासामें सेहो नायक–नायिकाक विरह–मिलन श्रृंगारक अतिरिक्त वैद धनवंतरिजी द्वारा देल गेल सुझाब –स्वस्थ शरीरके लेल कुन–कुन माहमे कि सब नहि खेमाक चाहि ओहू पर बारहमासा लिखने छथि –

साओनर साग ने भादवक दही ।
आसिनक ओस ने फागुन मही ।।
अगहनक जीर ने पुषक धनी ।
माघक मीसरी ने फागुन चना ।।
चैतक गुड ने वैसावह तेल ।
जेठक चलव ने अषाढक बेल ।।
कहे धनवंतरि अहि सबसे बचे ।
त वैदराज काहे पुरिया रचे ।।

विद्यापतिके श्रृंगारिक बारहमासाके कुछ अंश अहि तरहे छइन –

मास अखाड उनत नव मेघ ।
पिया बिसलेखे रहओ निरमेघ ।।
जेठ मास उजर नवरंग ।
केत चहए खल कामिनि संग ।।

बारहमासा जहिना षडऋतु सेहो एकटा गायन शैली अछि । अहिमें ऋतु सब –बसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमन्त आ शिशिरक वर्णन होइत अछि । एक ऋतु दू मास बराबर होइत छैक । ऋतु सौर आ चन्द्र दुई प्रकारक होइत अछि । धार्मिक कार्यमे चन्द्र ऋतु सब लेल जाइत अछि । जेना कि हम सब जनइत छिजे बारहमासामें विप्रलंभ आ विरह श्रृंगार होइत अछि । संयोग कालमें नायक आ नायिकाके पारस्परिक रतिके संयोग श्रृंगार कहल जाइत अछि । अहिमें संयोगक अर्थ सुखक प्राप्ति थिक । षडऋतुक एकटा निक उदाहरण–

प्रथम वसंत नवल ऋतु आई ।
सुऋतु चैत वैसाख सुहाई ।।
सावन–भादो अधिक सुहावा ।
आई सरद ऋतु अधिक प्यारी ।।

बारहमासामें जे प्रकृति मिलनमें बाधक बइन रहल देखल गेल अछि ,ओहे षडऋतुमें प्रकृति प्रिया आ प्रियतमाके मिलेबाक जरिया बनि जाइत छयैक । तईं मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोणसँ ई कहल जा सकैत अछि जे मनुखके जीवनमें घटित होमेवला समुच्चा घटना ओकर मन:स्थितिसँ निर्देशित वा नियन्त्रित होइत छयैक । पारम्परिक बारहमासामें बेनिया (पंखा), जियरा वा जिया, सैंय्या, जाडा, गर्मी, बरखा, संदेशवा, विदेशवा, झुलनी (नथ), फगवा (होली) आदि शब्दक बहुतायत प्रयोग होइत अछि (प्रसाद, २०२०) ।

बारहमासाक आधार लोकजीवन होइत अछि । तईं अहिमें लोकसंस्कृतिक झलक मिलैत अछि । प्रकृति हमरा सबके एकटा एहो सिखबैत अछि जे जीवनमें कहियो दुख छहि त खुशी सेहो अबैते अछि । दुखक क्षणमें हमरा लोकनिकें धैर्य रखबाक चाही ।

एक मशहूर पारंम्परिक बारहमासा अछि, जहिमें एक नव विवाहिता जकर पति कमेबाक लेल परदेस जाइवाला छहि, ओकरा अपन विवाहमे मिलल नभका झुलनी (नथ) सँ रिझेबाक आ पदरेस जाइसँ रोकबाक कोशिश करैत छहि । ओहि बारहमासाक किछु पंक्ति अछि –

नई झुलनी की छईयां ।
बलम दुपहरिया बिताय ला हो ।।
चार महिना क गर्मी पडत हैं ।।
टप–ट चुएला पसीनमा बलम ।।
जरा बेनिया डुलाय दा हो ।।

बरहमासाके किछु आर उदाहरण देखल जाए, जाहिमे बारहे मासक चर्च बहुत सटिक ढंगसँ कयल भेटैत अछि । उदाहरण–


चैत मे बेली फूलल, बैसाखमे दुइ फूल यो
जेठमे सन्ताम लागल, चढल मास अखाढ यो
साओन मे मेघ झडी लगाओल, भादब राति अन्हार यो
आसिन मे घर देवता नोतब, कातिक पुनीत नहाएब यो
अगहनेमे घर सारियल आबि गेल, पुरसमे हम जायब यो
माघमे ब्रज बाल औता, फागुन अबीर उडायब यो
२.
सरस मास फागुन थिक सखि रे, नहि रे शरद नहि घाम
ककरा संग हम होरी खेलब, बिनु रे मोहन एहि ठाम
विकल बिनु माधव रे मन मोर
बेली चमेली चम्पा फूल सखि रे, चैत कली चुनि लेल
हार शृंगार सभ किछु तेजल, मोहन मधुपुर गेल
विकल बिनु माधव रे मन मोर
यमुना तीर कदम जुडी छाहरि, मुरली टेरय मुरारी
रगडि चानन रौद बैसाखक, लय दौडल एक नारी
विकल बिनु माधव रे मन मोर
जेठमास जल–क्रीडा सखि रे, हरिजीसा रचब भजारी
वसन उतारि ऊपर कय धय देल, रहबमे हरिसँ उघारी
विकल बिनु माधव रे मन मोर
अधिक विरह तन उपजल सखि रे, आयल मास आषाढ
मनमोहन रितु ओतहि गमाओल, करबमे कओन उपाय
विकल बिनु माधव रे मन मोर
साओन सर्द सोहाओन सखि रे, खिल खिल हँसय किसान
चहुँदिसि मेघा बरिसि नेराबे, आजहु ने अयला हरिकन्त
विकल बिनु माधव रे मन मोर
भादव भलो ने होइहें कृष्णाजी के , जे कयल एतेक सिनेह
भादवक राति हम एसगरि खेपब, केहन दारुण दुख देल
विकल बिनु माधव रे मन मोर
आसिन सपन एक देखल, सेहो देखि किछु नहि भेल
जेहो किछु कृष्ण कहि जे गेला, मोहन मधुपुर गेल
विकल बिनु माधव रे मन मोर
कातिक कमल नरयन मोहन बिनु, कँ लो ने पडय दिन–राति
हहरत हिया भीजत मोर आँचर कुहुकि बिताबी दिन–राति
विकल बिनु माधव रे मन मोर
अगहन मे एक छल मनोरथ, औता मदन गोपाल
विकट पंथ पहु अबइत ने देखल, हमहुँ बैसल हिया हारि
विकल बिनु माधव रे मन मोर
पूसक जाड ठाढ भेल सखि रे………….

झुमरमे झुमैत मिथिला:
मिथिलाके झुमर गीतसभमे प्रयोग भेल विभिन्न मासक नामसँ एकरा ऋतु गीतके श्रेणीमे रहल पुष्टि होइत अछि । खास ककें एहिमें ‘संदेशात्मक’ आ ‘भावात्मक’ दू तरहे प्रस्तुति देखमामें अबैत छैक । एकटा भावनात्मक झुमर –

पिया जे कहे रामा जेठ हम आएव
बिती गेल मास असाढ मे सखि
घर पछुअखा मे कैथा रे भैया
पिया जोग चिट्ठी लिखि देहू हे सखि ।…..

किछु साहित्यकारसभ मैथिलीमे प्रचलित पावस गीतके रुपमे सेहो ऋतुगीतक वर्णन कयने छथि । पावस गीतमे मुरारी, मोहन, गिरधारीक सम्बोधन करैत नारीजन अपन सखिके मोनक बेदना अभिव्यक्त करबाक परम्परा छयैक –

सखि रे विसरल मोहि मुरारी ।
प्रथम आषाढ तेजल मोहि मोहन
कोन विधि खेपब अन्हारी
रिमझिम रिमझिम सावन वरसय
बैंसल सो असारी सखि रे विसरल
मदन मेघ बून्द वरसय भादव
हरि विसरल गिरधारी ।……..

सारांश : लोकचलनमें कायम रहल शैली, बोलीक संकलनके विद्वान लोकनि विश्वसनीय सन्दर्भ–ज्ञानके रुपमें मान्यता देबाक हिच्चिकिचाहट देखल गेल छई । मुदा अहि तरहे शैलि, भास आ बोलीक परम्परा मैथिलीके भाषाक रुपमें जीवन्त रहने अछि । एहि सन्दर्भमे डा. रामावातार यादवके द्वारा सन् २०१५ अगस्ट १२ में मैथिली विकास कोषक कार्यक्रममें प्रस्तुत एकटा आलेख समचिनि बुझाइत अइछ । आलेखमे यादव लिखैत छइथ, ‘मैथिली बारहमासा गीत एकगोट सुदीर्घ मौखिक/श्रुति, साहित्यिक परम्पराक अति समृद्ध एवं सौष्ठवपूर्ण धरोहर अइछ । तथापि, वर्तमानमें प्रकाशित अनेकहु ‘लोक’ तथा ‘संस्कार’ गीतक संकलनसभमे कतिपय समकालीन एवं ठेँठ भाषाक बारहमासा गीतसभ मुद्रित भेल अइछ । जकर भणितामे लेखक/कविक उल्लेख यदाकदा होइतहु तकर स्रोत, प्रकार, संकलन विधि वा संकलन काल आदि दँ कोनहु विश्वसनीय सन्दर्भ–ज्ञान प्रस्तुत नहि भेल अछि । मुदा ओ काज कर्ता के ? लोक–गीतके मानकीकरणसँ जोडबाक प्रयत्न अनुचित मात्र नहि किंकर्तव्यविमूढ बात थिक । मिथिलाञ्चलमे विभिन्न ऋतुक अवसरपर गाबैयवला लोकगीतसभके अपने मोहकता आ महत्ता रहलैए । वसन्त ऋतुराज छि त वर्षा ऋतुरानी । वर्षा ऋतुमेसँ साउन महिनाक सर्वाधिक महत्व सर्वविदित अइछ । कजरी, झुला, फगुआ अर्थात् होरी, चैतावर अर्थात् चौमासा, बारहमासा, पञ्चमासा, तीनमासासहितक लोकगीतसभ ऋतु सम्बन्धित लोकगीत अछि (राकेश, २०६५:२७) । लेखक डा.राजेन्द्र विमल बसन्त, पावस, मलार, छमासाके सेहो ऋतुगीत कहने छइथ । (२०७६माघ २६ रविदिन)

सन्दर्भ सामग्री :
१. प्रसाद, मिनाक्षी । सन् २०२० । लोक जीवन की कथाएं रचने वाली गायनशैली
‘बारहमासा’, नई दिल्ली :अमर उजाला ।
२. मिश्र, डा. ताराकान्त ।सन् २००८। मैथिली लोक साहित्य का अध्ययन, नई दिल्ली :नेसनल पब्लिसिङ हाउस ।
३. राहुल सांकृत्यायन(सं) । वि.सं. २०१७ । हिन्दी साहित्य का बृहत इतिहास, षोडश भाग, प्रस्तावना, प्रथम संस्करण, पृ.१५ , काशी: नागरी प्रचारिणी सभा ।
४. दैनिक जागरण । २०१७, मार्च २० । साहित्यक धरोहर को बजाए रखना जरुरी, बोकारो (भारत) : झाडखण्ड संस्करण ।
५. झा, चन्दनकुमार । सन २०१३–१४ । आधुनिक मैथिली गीतिकाव्य ओ परम्परा, पृष्ठ ६ । भारत सरकार : सेन्टर फर कल्चरल रेसोसेज एन्ड ट्रेनिङ, मिनिस्ट्रि अफ कल्चर ।
६. दीक्षित, सूर्यप्रसाद । सन २०१६ । अवध संस्कृति विश्वकोश । नया“ दिल्ली: वाणी प्रकाशन ।
७. तिवारी, कपिल (सम्पादक) । सन् २००९ । मध्यप्रदेश के जनपदीय ऋतु गीत । भोपाल (भारत) :आदिवासी लोक कला एवं तुलसी साहित्य अकादमी, मध्यप्रदेश संस्कृति परिषद् मध्यप्रदेश भारत ।
८. जोशी, प्रहलादचन्द ।सन् २००९। मध्यप्रदेश जनपदीय ऋतु गीत । भोपाल (भारत) :आदिवासी लोक कला एवं तुलसी साहित्य अकादमी, मध्यप्रदेश संस्कृति परिषद् मध्यप्रदेश भारत ।
९. राकेश, डा.रामदयाल । २०५६ । मैथिली संस्कृति । काठमाडौं : नेपाल राजकीय प्रज्ञा–प्रतिष्ठान कमलादी ।
१०. यादव, डा.रामावतार । २०७२ । भक्तपुर–नरेश जगत्प्रकाशमल्ल–विचरित अद्यावधि अप्राप्त/अशोधित एकगोटा मैथिली बारहमासा गीतक हस्तलिखित नेवारी पाण्डुलिपि : परिचयात्मक वर्णन–विश्लेषण । जनकपुर : मैथिली विकास कोष ।
११. विमल, डा. राजेन्द्र ।२०६२। मिथिलाको इतिहास, संस्कृति र कला–परम्परा । काठमाडौं : हिमालय बुक स्टल ।

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